धर्मात् प्रच्युतशीलं हि पुरुषं पापनिश्चयम् । त्यक्त्वा सुखमवाप्नोति हस्तादाशीविषं यथा ॥

श्रीमद्वाल्मीकिरामायणे युद्धकाण्डे  सप्ताशीतितमस्सर्गः (२२)

नृशंसमनृशंसं वा प्रजारक्षणकारणात् । पातकं वा सदोषं वा कर्तव्यं रक्षता सता ॥

— वाल्मीकिरामायणे बालकाण्डे पञ्चविंशस्सर्गः (१८) राक्षसी ताड़का के वध का आदेश देते हुए ब्रह्मऋषि विश्वामित्र ने श्रीराम से कहा “क्षत्रिय का यह पहला कर्त्तव्य होता है कि वह अपने सभी लोगों की रक्षा करे। अपने कर्त्तव्य का पालन करते समय किसी के प्राण लेने पड़े तो उसे संकोच  नहीं करना चाहिए।” श्रीराम ने, बिना दुविधा…

क्षमा दानं क्षमा यज्ञः क्षमा सत्यं हि पुत्रिकाः |क्षमा यशः क्षमा धर्मः क्षमया विष्ठितं जगत् ||

— वाल्मीकिरामायणे बालकाण्डे त्रयस्त्रिंशस्सर्गः (8) कुशनाभ की पुत्रियों के नैतिक आचरण पर वायुदेव ने उनको कुबड़ी हो जाने का शाप दिया था । यद्यपि वे वायुदेव को प्रतिशापित कर सकतीं थीं, तथापि उन्होंने वायुदेव को क्षमादान दिया । अपनी पुत्रियों के इस सदाचरण पर कुशनाभ ने उप्परोक्त श्लोक से क्षमागुण को गौरान्वित किया । यदि…

पिता हि प्रभुरस्माकं दैवतं परमं हि नः | यस्य नो दास्यति पिता स नो भर्ता भविष्यति ||

— वाल्मीकिरामायणे बालकाण्डे द्वात्रिंशस्सर्गः (२२) वायुदेव के विवाह प्रस्ताव पर कुशनाभ की पुत्रियों ने वायुदेव से कहा “हमारे पिता हमारे ईश्वर हैं और उनका हम पर पूर्ण अधिकार है । हमारे पति का चयन वे ही करेंगे ।” वायुदेव ने उन्हें, विवाह पश्चात, अमरत्व एवं चिरकालीन यौवन प्रदान करने का प्रलोभन भी दिया । वायुदेव…