नृशंसमनृशंसं वा प्रजारक्षणकारणात् । पातकं वा सदोषं वा कर्तव्यं रक्षता सता ॥

— वाल्मीकिरामायणे बालकाण्डे पञ्चविंशस्सर्गः (१८) राक्षसी ताड़का के वध का आदेश देते हुए ब्रह्मऋषि विश्वामित्र ने श्रीराम से कहा “क्षत्रिय का यह पहला कर्त्तव्य होता है कि वह अपने सभी लोगों की रक्षा करे। अपने कर्त्तव्य का पालन करते समय किसी के प्राण लेने पड़े तो उसे संकोच  नहीं करना चाहिए।” श्रीराम ने, बिना दुविधा…

क्षमा दानं क्षमा यज्ञः क्षमा सत्यं हि पुत्रिकाः |क्षमा यशः क्षमा धर्मः क्षमया विष्ठितं जगत् ||

— वाल्मीकिरामायणे बालकाण्डे त्रयस्त्रिंशस्सर्गः (8) कुशनाभ की पुत्रियों के नैतिक आचरण पर वायुदेव ने उनको कुबड़ी हो जाने का शाप दिया था । यद्यपि वे वायुदेव को प्रतिशापित कर सकतीं थीं, तथापि उन्होंने वायुदेव को क्षमादान दिया । अपनी पुत्रियों के इस सदाचरण पर कुशनाभ ने उप्परोक्त श्लोक से क्षमागुण को गौरान्वित किया । यदि…

पिता हि प्रभुरस्माकं दैवतं परमं हि नः | यस्य नो दास्यति पिता स नो भर्ता भविष्यति ||

— वाल्मीकिरामायणे बालकाण्डे द्वात्रिंशस्सर्गः (२२) वायुदेव के विवाह प्रस्ताव पर कुशनाभ की पुत्रियों ने वायुदेव से कहा “हमारे पिता हमारे ईश्वर हैं और उनका हम पर पूर्ण अधिकार है । हमारे पति का चयन वे ही करेंगे ।” वायुदेव ने उन्हें, विवाह पश्चात, अमरत्व एवं चिरकालीन यौवन प्रदान करने का प्रलोभन भी दिया । वायुदेव…

सेवमाने दृढं सूर्ये दिशमन्तकसेविताम् | विहीनतिलकेव स्त्री नोत्तरा दिक् प्रकाशते ||

— वाल्मीकिरामायणे अरण्यकाण्डे षोडशस्सर्गः (८) हेमंत ऋतु का वर्णन करते हुए लक्ष्मण श्रीराम से कहते हैं “इस ऋतु में सूर्यदेव दक्षिण दिशा की ओर झुक जाते हैं । फलतः उत्तर दिशा का आकाश निष्प्राण एवं निरुत्साहित लगता है, स्त्री के तिलकरहित मुख के भाँति” । इस राम-लक्ष्मण संवाद से वर्त्तमान समाज, जहाँ मंदिरों में भी लोग…

कच्चिद्गुरूंश्च वृद्धांश्च तापसान् देवतातिथीन् । चैत्यांश्च सर्वान् सिद्धार्थान् ब्राह्मणांश्च नमस्यसि ॥

— वाल्मीकिरामायणे अयोध्याकाण्डे शततमस्सर्गः (६२) श्रीराम ने अपने अनुज भरत से पूछा, “भरत ! नरेश होने के पश्चात भी क्या तुम गुरुओं, वृद्धों, तपस्विओं, देवताओं, अतिथिओं, पूजनीय स्थानों (जैसे मंदिर) एवं जीवजंतुओं (जैसे गौ, वृक्ष) और ब्राह्मणों को प्रणाम करते हो ?” श्रीराम के ये शब्द हमारे मार्गदर्शक हैं जब वर्त्तमान समय में हमने एक…

यां वृत्तिं वर्तते तातो यां च नः प्रपितामहाः । तां वृत्तिं वर्तसे कच्चित् या च सत्पथगा शुभा ॥

– वाल्मीकिरामायणे अयोध्याकाण्डे शततमस्सर्गः (७५) श्रीराम भरत से पूछते हैं “क्या तुम हमारे पूर्वजों के वृत्तियों का दृढ़ता से पालन करते हो ? इस सुपथ पर हर महान व्यक्ति चलते हैं ।” श्रीराम के इन शब्दों से हमें ‘सनातन धर्म’ का सही अर्थ पता लगता है । अमरकोश ‘वृत्तिः’ को ‘जीवनोपायः’ या ‘प्राणधारणम्’ के रूप…