क्षमा दानं क्षमा यज्ञः क्षमा सत्यं हि पुत्रिकाः |क्षमा यशः क्षमा धर्मः क्षमया विष्ठितं जगत् ||

— वाल्मीकिरामायणे बालकाण्डे त्रयस्त्रिंशस्सर्गः (8)

कुशनाभ की पुत्रियों के नैतिक आचरण पर वायुदेव ने उनको कुबड़ी हो जाने का शाप दिया था । यद्यपि वे वायुदेव को प्रतिशापित कर सकतीं थीं, तथापि उन्होंने वायुदेव को क्षमादान दिया । अपनी पुत्रियों के इस सदाचरण पर कुशनाभ ने उप्परोक्त श्लोक से क्षमागुण को गौरान्वित किया । यदि विश्व के सभी लोग इस श्लोक को सही से समझें और अपने आचरण में लाएं तो निश्चित ही सर्वत्र शान्ति एवं समरसता का वास होगा । इस प्रसंग में यह याद रखना चाहिए कि कोई अपने अपराधी को क्षमा कर सकता है। पर किसी अन्य के अपराधी को क्षमा करने का अधिकार उसे नहीं है । यह करना अधार्मिक है  (यह श्लोक देखें)।