कच्चिद्गुरूंश्च वृद्धांश्च तापसान् देवतातिथीन् । चैत्यांश्च सर्वान् सिद्धार्थान् ब्राह्मणांश्च नमस्यसि ॥

— वाल्मीकिरामायणे अयोध्याकाण्डे शततमस्सर्गः (६२)

श्रीराम ने अपने अनुज भरत से पूछा, “भरत ! नरेश होने के पश्चात भी क्या तुम गुरुओं, वृद्धों, तपस्विओं, देवताओं, अतिथिओं, पूजनीय स्थानों (जैसे मंदिर) एवं जीवजंतुओं (जैसे गौ, वृक्ष) और ब्राह्मणों को प्रणाम करते हो ?” श्रीराम के ये शब्द हमारे मार्गदर्शक हैं जब वर्त्तमान समय में हमने एक दूसरे को नमस्कार/प्रणाम करना छोड़ दिया है, जो हमारे अहंकार का नाश करने में भी सहायक होते हैं । आजकल, यदि इच्छा हो तो, हाथ मिलाकर या हेलो बोलकर ही हम एक दूसरे का स्वागत/अभिनन्दन करने लगे हैं ।